DNA आधारित पहली कोरोना वैक्सीन की सप्लाई शुरू, होगी अधिक प्रभावी

नई दिल्ली। देश में दिन-ब-दिन बढ़ते कोरोना और उसके नए वैरिएंट ओमिक्रोन के बढ़ते मामलों की टेंशन के बीच एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। बताया जा रहा है कि स्वदेशी कंपनी Zydus Cadila ने अपनी कोरोना वैक्सीन ZyCov-D की सप्लाई बाजारों में शुरू कर दी है। ऐसे में यह नई कोरना से लड़ने में देश को काफी मदद कर सकती है। वजह यह है कि यह वैक्सीन अभी तक इस्तेमाल में लाइ जाने वाली सभी वैक्सीनों से बिलकुल अलग है। पहली बात जो इसे एनी वैक्सीनों से अलग बनाती है, वो यह है कि इस वैक्सीन में सुई का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। यानी इसे लगाने पर मरीज को बिलकुल भी दर्द महसूस नहीं होगा। दूसरे बड़े फर्क की बात करें तो वह यह है कि यह वैक्सीन डीएनए आधारित है। यानी यह मरीज या व्यक्ति में डीएनए के माध्यम से प्रतिरोधक क्षमता का विकास करेगी, जिससे संभावित तौर पर अधिक और लंबे समय तक व्यक्ति का कोरोना से बचाव हो सकेगा।

बता दें, केंद्र सरकार ने इस वैक्सीन के 1 करोड़ डोज ऑर्डर किए थे। इसकी सप्लाई कंपनी ने शुरू कर दी है। ये वैक्सीन अभी सरकार की ओर से मुफ्त दी जाएगी। कंपनी ने इसकी एक डोज की कीमत 265 रुपये रखी है। इसके अलावा हर एक डोज पर 93 रुपये जीएसटी भी लगेगा। यानी, एक डोज की कुल कीमत 358 रुपये होगी।

खबरों के मुताबिक़ ये वैक्सीन भारत में अभी 18 साल से ऊपर के लोगों को लगाई जाएगी। इसके अलावा ये वैक्सीन तीन डोज वाली है, जो इसे बाकी वैक्सीन से अलग बनाती है।

बता दें जायडस कैडिला (Zydus Cadila) की वैक्सीन जायकोव-डी (ZyCov-D) को केंद्र सरकार ने पिछले साल अगस्त में ही मंजूरी दे दी थी। हालांकि, अब तक इस वैक्सीन का इस्तेमाल नहीं हो पाया था।

जैसा कि पहले बताया कि जायकोव-डी एक प्लाज्मिड-DNA वैक्सीन है। ये वैक्सीन शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने के लिए जेनेटिक मटेरियल का इस्तेमाल करती है।

अभी जो वैक्सीन हैं वो mRNA तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। इसे मैसेंजर RNA कहा जाता है। ये शरीर में जाकर कोरोना के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने का मैसेज देती है।

वहीं, प्लाज्मिड इंसानी कोशिकाओं में मौजूद एक छोटा DNA मॉलिक्यूल होता है। ये आमतौर पर बैक्टिरियल सेल में पाया जाता है। प्लाज्मिड-DNA शरीर में जाने पर वायरल प्रोटीन में बदल जाता है। इससे वायरस के खिलाफ मजबूत इम्यून रिस्पॉन्स पैदा होता है।

इस तरह की वैक्सीन की एक खास बात ये भी होती है कि इन्हें कुछ ही हफ्तों में अपडेट भी किया जा सकता है। अगर वायरस म्यूटेट करता है तो इसे चंद हफ्तों में बदला जा सकता है।

DNA वैक्सीन को ज्यादा असरदार और मजबूत माना जाता है। अब तक स्मॉलपॉक्स समेत कई बीमारियों की जो वैक्सीन मौजूद है, वो सभी DNA आधारित है।

जानकारी यह भी है कि अभी तक दुनियाभर में जितनी वैक्सीन लगाई जा रही है, वो या तो सिंगल डोज हैं या डबल डोज। लेकिन जायकोव-डी पहली वैक्सीन है जिसकी तीन डोज लगाई जाएगी।

ख़ास यह है कि इसमें सुई का इस्तेमाल नहीं होगा। इसे जेट इंजेक्टर से लगाया जाएगा। इससे वैक्सीन को हाई प्रेशर से लोगों की स्किन में इंजेक्ट किया जाएगा। इस डिवाइस का आविष्कार 1960 में हुआ था। WHO ने 2013 में इसके इस्तेमाल की अनुमति दी थी।

वहीं ध्यान देने वाली बात यह है कि जायकोव-डी दुनिया की पहली DNA बेस्ड वैक्सीन है। अभी तक जितनी भी वैक्सीन हैं, वो mRNA का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन ये प्लाज्मिड-DNA का इस्तेमाल करती है।

इसके अलावा बाकी वैक्सीन की तुलना में इसका रखरखाव ज्यादा आसान है। इसे 2 से 8 डिग्री सेल्सियस पर लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है। इतना ही नहीं, 25 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी इसे 4 महीने तक रखा जा सकता है। बता दें, इस वैक्सीन के तीन डोज 28-28 दिन के अंतर से लगाए जाएंगे। पहली डोज के बाद दूसरी डोज 28 दिन बाद और तीसरी डोज 56 दिन बाद लगाई जाएगी।

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