बड़ा निराला है अदब का शहर लखनऊ, अंग्रेज भी हो गए थे इसकी कलाकृतियों और कारीगरी के कायल

लक्ष्मणावती, लक्ष्मणपुर या लखनपुर के नाम से जिस शहर के चर्चे हुआ करते थे। उसे आज हम उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के नाम से जानते हैं। इन नामों के साथ यह नगरी कभी अवध के नाम से भी मशहूर हुआ करती थी। यह नाम इसे तब मिला जब लखनऊ में नावाबों की बादशाहत हुआ करती थी।

फिलहाल अब न तो यहां नवाब रहे और न ही रही उनकी बादशाहत, मगर यदाकदा उन दिनों को याद कर लोग इसे आज भी अवध कहकर पुकार लेते हैं।

इसके बावजूद आपको हैरानी होगी कि अवध लखनऊ का नाम नहीं, बल्कि अयोध्या में बसे कोशल राज्य का नाम था। इस नाम को अयोध्या से ही लिया गया है, जिसकी राजधानी कभी अयोध्या हुआ करता था। मगर चलन में आने के कारण लोग आज लखनऊ को ही भूलवश अवध के नाम से पुकार लेते हैं। जबकि हकीकत यह है कि इसे अवध क्षेत्र कहा जाता था, क्योंकि यह अंत में अवध की राजधानी घोषित किया गया था।

वहीं लखनऊ का एक इतिहास भागवान श्री राम से भी जुड़ा है। यह बताने की जरूरत तो नहीं, मगर बता देना बेहतर होगा कि इस नगर का नाम लखनपुरी यूं ही नहीं पड़ा था। यह नाम इस नगर को भगवान श्री राम के अनुज लक्ष्मण के नाम पर दिया गया था।

बताते चलें कि प्राचीन काल में अवध की राजधानी अयोध्या थी। बाद में फैजाबाद और उसके बाद लखनऊ हो गई।

साल 1722 से अवध में नवाबों का इतिहास शुरू होता है। जब सआदत अली खान ने यहां अवध वंश की स्थापना की थी। वहीं वाजिद अली शाह अवध के आखिरी नवाब थे। इन्हें अंग्रेजों ने कलकत्ता में कैद कर दिया और फिर 21 सितंबर 1887 को इनकी मौत हो गई।

जब अवध के राजा थे नवाब वाज़िद अली शाह

इतिहासकारों के अनुसार जब लखनऊ पर अंग्रेजो ने चढ़ाई कर दी थी तो सारे लोग महल से भाग गए थे। लेकिन वाजिद अली शाह की नवाबियत का आलम यह था कि उस समय नहीं भागे।

ऐसे में जब अंग्रेजों ने उनके न भागने की वजह पूछी तो अंग्रेजों के सवाल पर वाजिद अली शाह ने जवाब देते हुए कहा कि मेरे दरबान ने मुझे चप्पल नहीं पहनाई और मैं अपने हाथों से अपनी चप्पल नहीं पहनता। इसलिए मैं यहां से नहीं भागा। उसके बाद अंग्रेजो ने नवाब साहब को बन्दी बना लिया था।

वहीं यूरोपियन साम्राज्यों की नजर भी अवध पर कब्जे की थी। ऐसे में लखनऊ या अवध ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। उन्होंने सबसे पहले मुगल शासकों के साथ मिलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया के खिलाफ 1764 में बक्सर का युद्ध लड़ा। हालांकि यहां अग्रेज जीत गए, लेकिन वो अवध को अपना नहीं बना पाए।

इसके बाद अवध को कई बार अंग्रेजों ने अपने कब्जे में लेने की कोशिश की, इसमें वे कुछ हद तक कामयाब भी रहे, लेकिन वो इस पर अपना अधिकार नहीं कर पाए। अवध ने अंग्रेजों के सामने अपने घुटने नहीं टेके।

ऐसे में आज लखनऊ की संस्कृति, कला और अदब की जो मिसालें पेश की जाती हैं, वह मिसालें 18वीं और 19वीं सदी के दौरान नवाबों के शासनकाल से चली आ रही हैं। हालांकि, पुराने लखनऊ को बसाने और उसे बनाने का श्रेय चौथे नवाब असफउद्दौला को जाता है। तो आइए जानते हैं लखनऊ के इतिहास के बारे में…

पहले महमूद गजनवी, फिर मुगलों का शासन

इतिहासकारों का कहना है कि पहले कभी लखनऊ पर महमूद गजनवी का कब्जा था। उसके बाद 1526 ई। में यहां हुमायूं ने अपना कब्जा जमाया। इस तरह से लखनऊ मुगल सल्तनत का एक हिस्सा बन रहा। 

वहीं अकबर के शासनकाल के दौरान, शेख अब्दुल रहीम या शेख अब्दुल रहमान को लखनपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों का जागीरदार बना दिया गया। शेख अब्दुल रहीम ने यहां ऐतिहासिक मच्छी महल और अपने व अपनी पत्नियों के लिए 5 अन्य महलों का निर्माण कराया।

मच्छी महल के 26 मेहराबों में हरेक पर दो मछलियों के भित्ति चित्र उभरे हुए हैं। आगे चलकर यही दो मछलियां शेख, नवाबों और फिर अंग्रेजों का प्रतीक चिन्ह बन गईं।

सन 1722 में बुरहान-उल-मुल्क मीर मुहम्मद अमीन मुसावी सआदत खान उर्फ सआदत खान को अवध का गवर्नर नियुक्त किया गया। तब इन्हें वजीर उल मुल्क कहा जाता था।

अपनी नियुक्ति के बाद इन्हें शेख अब्दुल रहीम के वंशज शेख जादास की नाराजगी का सामना करना पड़ा। आखिरकार, दोनों में युद्ध हुआ और सआदत खान की प्रशिक्षित सेना ने मच्छी भवन पर कब्जा कर लिया। बस फिर क्या था, यहीं से अवध में नवाबों का दौर शुरू हो गया।

अवध में अंग्रेजों का प्रवेश

5 अक्टूबर 1754 को नवाब बने जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर के शासनकाल में अंग्रेजों का अवध में प्रवेश हुआ। 22 अक्टूबर 1764 को ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी के खिलाफ बक्सर के युद्ध में शुजाउद्दौला ने बंगाल के नवाब मीर कासिम और मुगल शासक शाह आलम का समर्थन किया था।

इससे पहले शुजाउद्दौला, अहमद शाह अब्दाली को बक्सर के युद्ध में हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद अंग्रेजों के साथ इन्होंने 50 लाख रुपए के भुगतान के बदले अवध का राज्य अंग्रेजों को सौंप दिया। हालांकि ये नवाब बने रहे। 26 जनवरी 1775 को शुजाउद्दौला की मौत के बाद आसफुद्दौला अवध के चौथे नवाब बने।

आसफुद्दौला ने अवध की राजधानी को फैजाबाद से हटाकर लखनऊ कर दिया। आसफुद्दौला ने कई बदलाव किए। लखनऊ में ईरान और इराक के शियाओं की तादाद बढ़ने लगी। जल्द ही लखनऊ में एक शक्तिशाली शिया संस्कृति का उदय हुआ। इसी समय आसफुद्दौला ने दौलत ख़ान का निर्माण कराया। वहीं, 1784 में रूमी दरवाजा और बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण कराया गया।

अंग्रेज लखनऊ में भवनों पर की गई कारीगरी से बहुत प्रभावित थे। माना जाता है कि अंग्रेज जनरल क्लाउड मार्टिन ने इन महलों को 10 लाख सोने के सिक्कों के बदले खरीदने की पेशकश भी कर दी थी।

अवध पर अंग्रेजों की हुकुमत

इस समय तक अवध में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ गया था। 21 सितंबर 1797 को आसफ़ुद्दौला की मौत हो गई। इसके बाद उनका पुत्र मिर्ज़ा वज़ीर अली ख़ान अवध का नवाब बना। हालांकि, अंग्रेजों को शक था कि वज़ीर अली ख़ान आसफ़ुद्दौला का बेटा नहीं है, इसलिए उन्होंने 1798 में उसे गद्दी से उतार दिया।

अंग्रेज अवध पर कब्जा करने की फिराक में थे। इसलिए उन्होंने कमजोर वज़ीर अली को हटाकर अपने विश्वासपात्र आसफ़ुद्दौला के भाई सआदत अली खान द्वितीय को नवाब बना दिया। इस दौरान भी लखनऊ में निर्माण कार्य नहीं रुके। सआदत अली खान ने दिलकुशा, हयात बक्श, फ़रहात बक्श व मशहूर लाल बारादरी का निर्माण कराया।

लॉर्ड वेलेजली ने 1801 में नवाबों से संधि कर ली। इसके अनुसार, नवाब को अपनी फौज को खत्म कर अंग्रेजों की सेना का सहारा लेना था। देखते ही देखते अवध राज्य के रोहिलखंड और इलाहाबाद भी ब्रिटिश साम्राज्य में मिल गए। सआदत अली की मौत के बाद के नवाब पूरी तरह से अंग्रेजों के रहमोकरम पर चल रहे थे।

हालांकि, उन्होंने अपने राज्य में शासन करने के लिए खुली छूट मांगी, लेकिन अंग्रेजों की नीति उनके ऊपर हावी थी। जबकि अवध लगभग पूरी तरह अंग्रेजों पर निर्भर हो गया था।

अंग्रेजों के आगे नहीं झुके नवाब वाजिद अली

आखिरकार, 13 फरवरी 1847 को नवाब अमजद अली शाह की मौत के बाद वाजिद अली शाह अवध के नवाब बने। वाजिद अली शाह अवध के स्वतंत्र शासक और नवाब थे। जिन्होंने अंग्रेजों के सामने झुकना कभी भी स्वीकार नहीं किया।

बेगम हज़रत महल ने संभाला था अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा

दिल्ली से उठी क्रांति की ज्वाला धीरे-धीरे पूरे हिंदुस्तान में फैल रही थी, लेकिन अवध की प्रजा अपने नवाब का बेसब्री से इंतजार कर रही थी। ऐसे में वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल ने अवध का कार्यभार संभाला।

अवध की सेना ने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे लंबी लड़ाई लड़ी, जिसमें अंग्रेजों ने लखनऊ पर कब्जा जमा लिया। इस कारण बेगम हजरत महल को लखनऊ छोड़ना पड़ा। अवध की ये लड़ाई भी लगभग समाप्त हो गई और बेगम हज़रत महल यहां से दूर नेपाल चली गईं, जहां लगभग 30 साल बाद उनकी मौत हो गई।

आखिरकार, 1857 की क्रांति समाप्त हुई, बावजूद इसके अंग्रेज 7 जनवरी 1859 तक पूरी तरह से अवध पर कब्जा जमा पाए।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 × 2 =

Back to top button