बलिदान दिवस पर आजादी के तरानों से गूंजी कारगिल शहीद वाटिका

लखनऊ कारगिल शहीद वाटिका में बुधवार शाम बलिदान दिवस के अवसर पर हम में है भगत कार्यक्रम का आयोजन पर बड़ी संख्या में युवाओं ने हम में है भगत टी-शर्ट व पगड़ी पहन कर और हाथों में तिरंगा के साथ इंकलाब जिंदाबाद, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु अमर रहे के उद्घोष के साथ ऐ मेरे वतन के लोगों…,अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों…., ये देश है वीर जवानों का…, दिल दिया है जान भी देंगे…., मां तुझे सलाम…,

देशभक्ति गीतों पर थिरकते देख रहे थे।

कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा, महापौर संयुक्ता भाटिया,  कानून मंत्री बृजेश पाठक, विधायक नीरज बोरा, भाजपा नगर अध्यक्ष मुकेश शर्मा ने कार्यक्रम में भगत सिंह सुखदेव राजगुरु को पुष्पांजलि अर्पित किया।

कार्यक्रम संयोजक अभिषेक खरे ने कहा कि विगत वर्षों के भांति इस वर्ष भी बलिदान दिवस हमें है भगत कार्यक्रम का आयोजन बड़ी श्रद्धा सुमन के साथ आयोजित किया गया है।  23 वर्ष की आयु में आजादी के लिए हंसते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ने वाले भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के लिए हम सभी सदैव ऋणी रहेंगे।

वहीं समाज के वरिष्ठजनों ने राजेंद्र अग्रवाल, अमरनाथ मिश्र, भारत भूषण गुप्ता, पंकज अग्रवाल, सहसंयोजक मनीष गुप्ता, विजय शर्मा, विमर्श रस्तोगी, मीडिया महामंत्री अनुराग साहू, विनय शुक्ला, ओपी सिंह, सुमित कपूर, सतीश अग्रवाल, मनोज सिंह पुजारी, राजेंद्र अग्रवाल, अमरनाथ मिश्रा ,देवेंद्र गुप्ता ,विनोद महेश्वरी, ऋषि कपूर, मुदित कपूर, सतपाल सिंह मीत,  हरविंदर पाल सिंह नीटा, संतोष त्रिपाठी, पंकज अग्रवाल, आलोक अग्रवाल, रवि गुप्ता, रामू गुप्ता, सोनू जायसवाल, अजय अग्रवाल, भारती गुप्ता ने श्रद्धा सुमन के साथ पुष्प अर्पित किए।

कार्यक्रम सहसंयोजक मनीष गुप्ता ने बलिदान दिवस पर इतिहास को याद करते हुए कहा कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने आठ अप्रैल 1929 को असेंबली में बम फेंका था। भगत सिंह ने बम फेंकते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि कोई सदस्य उसकी चपेट में न आए। यहीं पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने समर्पण कर दिया था।

भगत सिंह ने अपनी वह आटोमैटिक पिस्तौल सरेंडर की, जिससे उन्होंने 1928 में क्रांतिकारी साथियों राजगुरु व सुखदेख के साथ मिलकर लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जान सांडर्स के शरीर में गोलियां दागी थीं। दोनों को 12 जून को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत ने इस फैसले के खिलाफ अपील की थी। अदालत ने 13 जनवरी 1930 को दोनों की अपील खारिज कर दी। भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को 23 मार्च 1931 को लाहौर षड़यंत्र के आरोप में फांसी दी गई थी।

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